
रात का समय था। शहर के एक कोने में फैली झुग्गियों के बीच हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। टीन की छतों पर गिरती बूंदों की आवाज जैसे हर घर की कहानी कह रही थी—कहीं भूख, कहीं दर्द, कहीं टूटे सपने।
उसी झुग्गी में एक छोटा सा कमरा था, जहां आरव अपनी माँ के साथ रहता था। कमरे में एक पुराना पंखा, एक टूटी चारपाई और कोने में रखा चूल्हा—बस यही उनकी दुनिया थी।
आरव भीगते हुए घर के अंदर घुसा। उसके कपड़े पूरी तरह गीले थे और चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी। उसने दरवाज़ा बंद करते हुए धीरे से अपनी माँ को आवाज दी, जैसे वो जानता हो कि माँ को जगाना नहीं चाहिए, पर फिर भी दिल चाहता हो कि कोई पूछे—"तू ठीक है ना?"
माँ चूल्हे के पास बैठी थी, हाथ में सूखी लकड़ी लिए, जैसे उसका इंतज़ार कर रही हो। उसने उसे देखते ही हल्की मुस्कान दी, लेकिन आँखों में चिंता छुपी नहीं थी। उसने प्यार से पूछा कि आज फिर देर हो गई, क्या काम ज़्यादा था या कोई और परेशानी हो गई?
आरव ने भीगते बाल झटकते हुए हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की और बोला कि काम तो हमेशा जैसा ही था, लेकिन मालिक ने आज फिर पैसे काट लिए। उसने ये बात ऐसे कही जैसे ये उसके लिए अब नई नहीं रही।
माँ ने गहरी सांस ली और धीरे से पूछा कि आखिर कब तक वो ऐसे ही लोगों की बेइज्जती सहता रहेगा। उसकी आवाज में गुस्सा नहीं था, सिर्फ दर्द था।
आरव ने उसकी तरफ देखते हुए थोड़ा सख्त लहजे में कहा कि अगर वो ये काम भी छोड़ देगा तो खाएंगे क्या। उसने माँ को समझाने की कोशिश की कि दुनिया में गरीब के पास इज्जत नहीं होती, सिर्फ पेट भरने की लड़ाई होती है।
माँ ने उसके हाथ पकड़ते हुए कहा कि वो गरीब जरूर हैं, लेकिन इज्जत बेचने की जरूरत नहीं है। उसने जैसे कुछ कहना चाहा, लेकिन खुद को रोक लिया।
आरव ने ये नोटिस किया। उसने शक भरी नजरों से माँ की तरफ देखा और पूछा कि वो हर बार कुछ कहकर रुक क्यों जाती है, जैसे उसे कोई बड़ा राज पता हो।
माँ ने तुरंत नजरें झुका लीं और कहा कि ऐसा कुछ नहीं है, वो बस उसकी फिक्र करती है।
आरव ने बात को वहीं खत्म कर दिया, लेकिन उसके मन में सवाल बैठ गया।
कुछ देर बाद वो खाना खाकर बाहर निकल गया। बारिश अब रुक चुकी थी, लेकिन सड़कें अभी भी गीली थीं। वो अपने दोस्त विजय से मिलने जा रहा था।
गली के मोड़ पर विजय पहले से खड़ा था, हाथ में सिगरेट लिए। उसने आरव को देखते ही मुस्कुराते हुए कहा कि आज फिर देर कर दी, कहीं मालिक ने फिर से डांटा तो नहीं?
आरव ने हल्की हंसी के साथ जवाब दिया कि डांटना तो जैसे उसका रोज का काम हो गया है। उसने विजय से कहा कि कभी-कभी लगता है जिंदगी बस ऐसे ही गुजर जाएगी—ना कोई बदलाव, ना कोई उम्मीद।
विजय ने सिगरेट का कश लेते हुए थोड़ा गंभीर होकर कहा कि हर इंसान की किस्मत बदलती है, बस सही समय का इंतजार करना पड़ता है।
आरव ने हंसते हुए कहा कि उसका समय शायद भूल गया है रास्ता।
तभी अचानक पीछे से कुछ लड़कों की आवाज आई। चार-पांच लोग थे, जिनमें से एक आगे बढ़ा और सीधे आरव के पास आकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर घमंड साफ दिख रहा था।
उसने ताने मारते हुए कहा कि ये वही लड़का है ना जो हर महीने उधार मांगता है और फिर चुपके से भाग जाता है।
आरव ने शांत रहने की कोशिश करते हुए कहा कि उसने कभी भागने की कोशिश नहीं की, बस वक्त खराब चल रहा है।
वो लड़का जोर से हंसा और बाकी लोग भी हंसने लगे। उसने गुस्से में आकर आरव का कॉलर पकड़ लिया और कहा कि गरीब लोग हमेशा यही बहाना बनाते हैं।
विजय बीच में आया और उसने उस लड़के का हाथ हटाते हुए कहा कि बात करने का तरीका होता है, ऐसे किसी को पकड़ना ठीक नहीं।
लेकिन बात बढ़ गई। कुछ ही सेकंड में हाथापाई शुरू हो गई। आरव ने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन वो लोग ज्यादा थे।
एक ने पीछे से उसे धक्का दिया, जिससे वो सड़क पर गिर पड़ा। उसके चेहरे पर चोट लग गई, और खून बहने लगा।
वो लड़का नीचे झुककर उसके पास आया और धीरे से उसके कान में कहा कि अपनी औकात में रहना सीख ले, वरना अगली बार उठ नहीं पाएगा।
ये कहकर वो सब हंसते हुए चले गए।
विजय ने तुरंत आरव को उठाया और उसे संभालते हुए कहा कि उसे अस्पताल चलना चाहिए, लेकिन आरव ने मना कर दिया।
उसने गुस्से से भरी आंखों से सामने देखा और कहा कि एक दिन वो इन सबको जवाब देगा।
विजय ने उसकी हालत देखकर कहा कि बदला लेने के लिए ताकत चाहिए, और उनके पास अभी कुछ नहीं है।
आरव ने धीमे लेकिन ठोस शब्दों में कहा कि शायद अभी नहीं, लेकिन एक दिन जरूर होगा।
वो दोनों धीरे-धीरे वापस लौटने लगे।
उसी समय, दूर सड़क के किनारे एक काली गाड़ी खड़ी थी। गाड़ी के अंदर बैठा एक आदमी ध्यान से ये सब देख रहा था।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, जैसे उसे वही मिल गया हो जिसकी उसे तलाश थी।
उसने अपने फोन पर किसी को कॉल किया और बहुत शांत आवाज में कहा कि आखिरकार वो मिल गया... वही लड़का।
फोन के दूसरी तरफ से किसी ने कुछ पूछा, तो उसने जवाब दिया कि हाँ, कोई शक नहीं है… यही है।
कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद उसने एक और बात कही—और इस बार उसकी आवाज में गंभीरता थी—अब खेल शुरू होगा।
गाड़ी धीरे-धीरे वहां से चली गई, और आरव को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि कोई उसे देख रहा था… और उसकी जिंदगी अब बदलने वाली है।
उसी रात, जब आरव घर लौटा और सोने की कोशिश कर रहा था, उसकी माँ एक पुराने बॉक्स के सामने बैठी थी।
उसने बॉक्स खोला और उसमें से एक फोटो निकाली—उस फोटो में एक छोटा बच्चा था, महंगे कपड़ों में, और उसके साथ खड़े थे कुछ बहुत बड़े लोग।
माँ की आंखों में आंसू आ गए।
उसने फोटो को देखते हुए धीरे से कहा कि सच कब तक छुपेगा…
और तभी बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।
दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
माँ चौंक गई।
उसने डरते हुए दरवाज़ा खोला।
बाहर वही काली गाड़ी वाला आदमी खड़ा था।
उसने मुस्कुराते हुए बहुत शांत लेकिन खतरनाक अंदाज में कहा कि अब छुपाने का समय खत्म हो गया है… क्योंकि उन्हें सब पता चल चुका है कि आरव कौन है।
माँ के हाथ से वो फोटो गिर गई…
और यहीं पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया—
आखिर आरव कौन है…?
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